मंत्र साधना से जुडी ख़ास बातें

मन्त्र साधना  - मन्त्र के तीन तत्व होते है – शब्द ,संकल्प और साधना |


मन्त्र का पहला तत्व शब्द - शब्द मन के भावो को वहन करता है | मन के भाव शब्द के वाहन पर चढकर यात्रा करते है | कोई विचार सम्प्रेषण का प्रयोग करके , कोई औटोसजेशन का प्रयोग करके , उसे सबसे पहले ध्वनि का , शब्द का सहारा लेना पड़ता है | वह व्यक्ति अपने मन के भावो को तेज ध्वनि में उच्चारित करता है ,जोर जोर से बोलता है ,ध्वनि की तरंगे करता है ,मंद कर देता है पहले ओठ ,दांत ,कंठ सब अधिक सक्रिय थे , वे मंद हो जाते है | ध्वनि मंद हो जाती है | होंठो तक आवाज पहुँचती है पर बाहर नहीं निकलती | जोर से बोलना या मंद स्वर में बोलना – दोनों कंठ के प्रयत्न है | ये स्वर तंत्र के प्रयत्न है जहाँ कंठ का प्रयत्न होता है वह शक्तिशाली तो होता है किन्तु बहुत शक्तिशाली नही होता है | उसका परिणाम आता है किन्तु उतना परिणाम नहीं जितना हम मन्त्र से उम्मीद करते है | मन्त्र को वास्तविक परिणति या मूर्धन्य परिणाम तब आता है जब कंठ की क्रिया समाप्त हो जाती है और मन्त्र हमारे दर्शन केंद्र में पहुँच जाता है | यह मानसिक क्रिया है | जब मन्त्र की मानसिक क्रिया होती है , मानसिक जप होता है ,तब न कंठ की क्रिया होती है , न जीभ हिलती है ,न होंठ एवं दांत हिलते है | स्वर तंत्र का कोई भी प्रकम्पन नही होता| मन ज्योति केंद्र में केन्द्रित हो जाता है

मानसिक जप के बिना मन की स्वस्थता की भी हम कल्पना नहीं कर सकते | मन का स्वास्थ्य हमारे चेतन्य केन्द्रों की सक्रियता पर निर्भर है | जब हमारे दर्शन केंद्र और ज्योति केंद्र सक्रिय हो जाते है तब हमारी शक्ति का स्त्रोत फूटता है और मन शक्तिशाली बन जाता है | नियम है – मन जहाँ जाता है ,वहाँ प्राण का प्रवाह भी जाता है | जिस स्थान पर मन केंदित होता है ,प्राण उस और दौड़ने लगता है | जब मन को प्राण का पूरा सिंचन मिल जाता है और शरीर के उस भाग के सारे अवयवो को ,अणुओ और परमाणुओं को प्राण और मन का सिंचन मिलता है तब वे सारे सक्रिय हो जाते है | जो कण सोये हुए है ,वे जग जाते है | चेतन्य केंद को जागृत हुआ तब मानना चाहिए जब उस स्थान पर मन्त्र ज्योति में डूबा हुआ दिखाई पड़ने लग जाए | जब मन्त्र बिजली के अक्षरों में दिखने लग जाए तब मानना चाहिए वह चेतन्य केंद जाग्रत हो गया है |

मन्त्र का पहला तत्व है शब्द और शब्द से अशब्द अपने स्वरूप को छोडकर प्राण में विलीन हो जाता है , मन में विलीन हो जाता है तब वह अशब्द बन जाता है |

मन्त्र का दूसरा तत्व है – संकल्प | साधक की संकल्प शक्ति दृढ़ होनी चाहिए | यदि संकल्प शक्ति दुर्बल है तो मन्त्र की उपासना उतना फल नहीं दे सकती , जितने फल की अपेक्षा की जाती है | मन्त्र साधक में विशवास की दृढ़ता होनी चाहिए | उसकी श्रध्दा और इच्छाशक्ति गहरी होनी चाहिए | साधक में यह विशवास होना चाहिए की जो कुछ वह कर रहा है अवश्य ही फलदायी होगा | सफलता में काल की अवधि का अन्तराल आ सकता है | किसी को एक महीने में , किसी को दो चार महीने और किसी को वर्ष भर बाद ही सफलता मिले |

संकल्प तत्व में श्रध्दा समन्वित है श्रध्दा का अर्थ है – तीव्रतम आकर्षण | केवल श्रध्दा के बल पर जो घटित हो सकता है ,वह श्रध्दा के बिना घटित नहीं हो सकता है | पानी तरल है ,जब वह जम जाता है ,सघन हो जाता है तब वह बर्फ बन जाता है | जो हमारी कल्पना है , जो हमारी चिंतन है तरल पानी की तरह है | जब चिंतन का पानी जमता है तब वह श्रध्दा बन जाता है | तरल पानी में कुछ गिरेगा तो पानी गन्दा हो जाता है |बर्फ पर जो कुछ गिरेगा ,वह नीचे लुढक जायेगा ,उसमे घुलेगा नहीं | जब हमारा चिंतन श्रध्दा में बदल जाता है तब वह इतना घनीभूत हो जाता है की बाहर का प्रभाव कम से कम हो जाता है |

मन्त्र का तीसरा तत्व है -  साधना | शब्द भी ,आत्मविश्वास भी है और संकल्प भी है तथा श्रध्दा भी है ,किन्तु साधना के अभाव में मन्त्र फलदायी नहीं हो सकता| जबतक मन्त्र साधक आरोहण करते –करते मन्त्र को प्राणमय न बना दे तबतक सतत साधना करते रहे | योगसूत्र में पतंजलि कहते है की “–दीर्घकाल नैरन्तर्य सत्कारा सेवित :” ध्यान की तीन शर्त है दीर्घकाल , निरंतरता और निष्कपट अभ्यास | साधना में  दीर्घकालीनता और  निरंतरता दोनों ही अपेक्षित है | अभ्यास को प्रतिदिन दोहराना चाहिए | आज आपने ऊर्जा का एक वातावरण तैयार किया ,कल उस प्रयत्न को छोड़ देते है तो वह ऊर्जा का वायुमंडल स्वत: शिथिल हो जाता है |

साधना का काल दीर्घ होना चाहिए | ऐसा नही की काल छोटा हो | दीर्घकाल का अर्थ है जब तक मन्त्र का जागरण न हो जाए , मन्त्र चेतन्य न हो जाय ,जो मन्त्र शब्दमय था वह एक ज्योति के रूप में प्रकट न हो जाए ,तबतक साधना करते रहना चाहिए | अध्यात्म की शैव-धारा में “ ॐ नम: शिवाय ”  एक महा मन्त्र है | इस महामंत्र की सिद्धि जीवन की सिद्धि है | इस मन्त्र की साधना से भौतिक व् आध्यात्मिक दोनों उपलब्धिया प्राप्त होती है | आवश्यकता है उसे अपना कर अनुभव करने की |

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