माँ की याद में- हर माँ को समर्पित एक सच्ची कविता।

माँ के जाने के बाद का दर्द महसूस किया है कभी? नहीं किया तो जरूर पढ़ें :- ' माँ की याद   ' में कविता -


माँ व्याधियो से घिर गया हूँ


अब तुम्हारी याद आती है


घर की हर जगह देती है आभास


कि  तुम हो यहीं कहीं आस-पास


बातो का वही सिलसिला


कही धुप में बैठ कर बतियाता हूँ


तुम से मिला है जीवन दान


अब बुढ़ापे की और बढ़ रहा हूँ


तुम्हारे जैसे कष्ट भोग रहा हूँ


धोती के कोने से आँख पोंछती


पीठ पर हाथ फेरती


बुदबुदाती सी कहती हो


इस पर दया करो भगवान


तभी टूटता है भ्रम का क्रम


अब तुम कहा हो ?


मेरे सामने ही तो


हुई थी अस्त , असाध्य रोग से थी त्रस्त


साथ चाय पीने का टुटा था क्रम


अंतिम बोल थे उस दिन


क्या अब चाय ही पिलाता रहेगा


कन्धा दबाते हुए समझ रहा था


तुम्हारे ह्रदय का धीमा था स्पंदन


पप्पू गोद मर ले गया था बाथरूम तक


निवृत होने पर विश्राम की बात कह


उसी की गोद में ली थी अंतिम साँस


सेवा उसी ने की थी अथक


शून्य हुए सभी स्पंदन


लेकर बैठ गया धरा पर


दुलारा था सबका पृथक


विलख पड़े परिजन स्वर्ण , तुलसीदल


घट में उतर गया गंगाजल


तुम्हारी चाह भी यही थी


भजन के बोल भी थे


हे नाथ ऐसा करना


जब प्राण तन से निकले


मुँह में तुलसीदल और गंगाजल हो


मैं हंसकर कहता था


क्या तुम देख पाओगी ?


तुम कहती थी तू कुछ नहीं करेगा


पप्पू पर था भरोसा


अतीत में डूबा


मैं एकटक देख रहा था तन


रोग के सभी चिन्ह थे विलुप्त


मुख पर आभा थी चन्दन सी


यही काया खटती रही थी


पुरखो का घर बसाने को


मर्यादा बनी रही , परिवार बने रहे


सुख दुख के गलियारे में


उम्रभर जीती रही


अब विश्राम मिला


कभी न उठने के लिए


निर्विकार , निर्लिप्त न कोई मोह


न विछोह का दुःख


संजोया था एक घर


छोड़ हुई अब मुक्त


पुरखो के घर में ही शरीर हुआ शांत


साथ थी एकादशी अनुष्ठान की


गौदान की


खुश भी खूब हुई


देख परिजनों का संगम


चन्दन , पुष्प ,अबीर से


सज गई पावन काया


राम नाम सत्य है के घोष पर


छोड़ दिया द्वार पुरखो का


गंगा तट पर सजी चिता


वर्षो की याद से जुडी काया


परम्पराओ में हो गई विलीन


सदियों के चलचित्र


हो गए लुप्त , जीवन का सत्य


फिर भी गुप्त , सब देखा था


सजल आँखों से फिर भी भ्रम होता है


फिर भी बात करने को


मन करता है

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