स्वामी विवेकानंद के विचारो की प्रासंगिकता

स्वामी विवेकानंद के विचारो की प्रासंगिकता


स्वामी जी कहते है की हमारा धर्म ही हमारे तेज ,हमारे बल ,यही नही हमारे राष्ट्रीय जीवन का ही मूल आधार है | इस समय मैं यह तर्क वितर्क करने नहीं जा रहा हूँ कि धर्म उचित है या नहीं ,सही या नहीं और अंत तक यह लाभदायक है या नही | किन्तु अच्छा हो या बुरा , धर्म तो हमारे राष्ट्रीय जीवन का प्राण है ,तुम उससे निकल नहीं सकते | अभी और चिरकाल के लिए भी तुम्हे उसी का अवलम्ब ग्रहण करना होगा और तुम्हे उसी के आधार पर खड़े होना होगा ,चाहे तुम्हे इस पर विश्वास हो या न हो , जो मुझे है | तुम इसी धर्म में बंधे हुए हो , और अगर तुम इसे छोड़ दो तो चूर चूर हो जाओगे |

स्वामीजी का चिंतन भारतीय सामाजिक व्यवस्था में बदलाव लाना था वे एक सन्यासी के रूप में समाज सुधारक थे | समाज के संदर्भ में उनके द्वरा दिया गया विचार आज भी प्रासंगिक  है | उन्होंने एक समाजशास्त्री की भांति समाज से जुड़े हुए कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर बड़ी गंभीरता से विचार किया है |

स्वामीजी आगे कहते है की मेरा विचार है , पहले हमारे शास्त्र ग्रन्थो से भरे पड़े आध्यात्मिकता के रत्नों को ,जो कुछ ही मनुष्यों के अधिकार में मठो और अरण्यो में छिपे हुए है , बाहर लाना होगा | जिन लोगो के अधिकार में ये छिपे हुए है , केवल उन्ही से इस ज्ञान का उध्दार करना पर्याप्त न होगा, वरना उससे भी दुर्भेध पेटिका अर्थात जिस भाषा में ये सुरक्षित है ,उस संस्कृत भाषा के शताब्दियों के पर्त खाये हुए अभेध शब्द जाल से उन्हें निकालना होगा | तात्पर्य यह है की मैं उन्हें सब लिए सुलभ कर देना चाहता हूँ | मैं इन तत्वों को निकाल कर सब की , भारत के प्रत्येक मनुष्य की ,सामान्य सम्पति बनाना चाहता हूँ ,चाहे वह संस्कृत जानता हो या नहीं |

स्वामीजी का विचार सामाजिक बुराईयों को खत्म कर समाज में एक अच्छी राह दिखाना था उन्होंने युवा वर्ग को इन बुराईयों को समूल नष्ट करने के लिए आगे आने के लिए कहा था | उनका मानना था की समाज में बदलाव युवा वर्ग ही कर सकता है |

इस संसार में सांसारिकता का प्रबल आकर्षण है | वस्तुएं ,सम्बन्ध ,आदि बड़े ही मनोरम और लुभावने लगते है ,इन्हें पाने का मन करता है ,पाने के लिए पुरुषार्थ भी किया जाता है | इसी प्रकार धन ,पद ,प्रतिष्ठा ,मान सम्मान का आकर्षण है | नियति के अनुसार सबको मिलता भी है , प्र यह यह अंतिम सत्य नहीं है | एक को पाने के बाद चौथे की और ये अंतहीन सिलसिला चल पड़ता है तथा बेशकीमती मानव जीवन इसी मृग मरीचिका के पीछे दौड़ते हुए समाप्त हो जाता है | वासना का चर्म आकर्षण ऐसी अग्नि है जो कभी शांत नहीं होती , निरंतर बढती जाती है वासना एक आभास है ,इसके थामने पर ही सत्य का साक्षात्कार संभव है | अत: इसमें जलकर अपनी जीवन ऊर्जा को नष्ट करने के बजाय इसका शमन करना चाहिए , यह शमन होता है चरित्र निर्माण से |

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