शहरों का अस्तित्व गाँव की खुशहाली में

शहरों का अस्तित्व गाँव की खुशहाली में


नई अर्थनीति के अनुसार यदि औद्योगिक पूंजीवाद में भारतीय गाँवों का भविष्य ठीक नहीं है तो प्रश्न उठता है की की इससे शहरों का कोई अच्छा भविष्य दिखने वाला है ? आए दिन शहरों की समस्या भी गंभीर होती जा रही है जो शहर कुछ कम आबादी वाले थे वे अब लाखो की संख्या में बढते जा रहे है , फलस्वरूप उनकी आवश्यकताओं को पूरा कर पाना नगर निगमों के लिए असम्भव होता जा रहा है | बिजली , पानी , मकान की किल्लत , बढ़ते यातायात की घिचपिच व प्रदुषण से वातावरण नरक होता जा रहा है | आज की स्थिति में शायद ही कोई शहर साफ सुथरा हो , शहरों में गाँव से भागती आबादी का दबाव बढता जा रहा है , जो शहरों को गन्दा तथा बदसूरत बनाता जा रहा है शहरों में विषमता तो पहले से ही थी , जो अब दिन व् दिन बढती जा रही है , जिसके कारण अन्याय समस्याओं के साथ अपराधो में भी निरंतर बढोतरी हो रही है | इससे यह स्पष्ट होता है की अगर देश के गाँवो को सुखी नहीं रखा गया तो , देश के शहर भी सुखी नहीं रह पाएंगे |

इस पीड़ा के चलते पूरा देश भयावह समस्या से ग्रस्त हो जायेगा , अत: जरुरी है की समय रहते इस पर विचार कर शहरों के साथ गाँवों का विकास भी किया जाय |

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शहरों में नये खुलने वाले शिक्षण संस्थान , स्वास्थ्य केंद्र ,उधोग आदि अन्य सुविधा वाले संस्थाओ को सुदूर ग्रामीण इलाको में खोला जाय और गाँवो में आवागमन की सुविधा बढ़ायी जाय | इससे शहरों की ओर दबाव कम होगा और राष्ट सशक्त तथा संपन्न बनेगा | ग्रामीण युवाओ को रोजगार मिलेगा तो बेरोजगारी मिटेगी और ग्रामीण जन परिवार भी खुशहाली का जीवन जी सकेगा | इसके लिए सरकार , संस्थाओ तथा राष्ट नायको को चिन्तन कर रोजगारपरक सस्ती ,सुलभ एवं रुचिकर योजना बनानी व्  किर्यान्वित करानी होगी तभी ग्राम उत्थान का सपना सच हो सकेगा और भारत के महान होने का सपना साकार हो सकेगा |

 

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